सीधी। सीधी जिले में रेत खनन और परिवहन व्यवस्था को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं। आरोप है कि रेत परिवहन में लगे डंपरों से एक ही ई-ट्रांजिट पास (ई-टीपी) का इस्तेमाल कर तीन से चार बार तक रेत की ढुलाई की जा रही है। यदि शिकायत में लगाए गए आरोप जांच में सही पाए जाते हैं, तो यह मामला न केवल खनिज परिवहन व्यवस्था की निगरानी, बल्कि शासन के राजस्व और नियमों के अनुपालन से भी जुड़ा महत्वपूर्ण प्रकरण बन सकता है। शिकायतकर्ताओं ने ई-टीपी के कथित दुरुपयोग से सरकार को करोड़ों रुपये की राजस्व हानि होने की आशंका जताते हुए उच्चस्तरीय जांच और दोषियों के विरुद्ध कार्रवाई की मांग की है।
मामले की शिकायत प्रमुख सचिव, खनिज साधन विभाग और प्रबंध संचालक, मध्यप्रदेश राज्य खनिज निगम तक पहुंचने की जानकारी सामने आई है। शिकायतकर्ताओं का दावा है कि 33 घंटे की वैधता वाले ई-टीपी पर एक ही वाहन से कई बार रेत का परिवहन कराया जा रहा है। उन्होंने अपने आरोपों के समर्थन में पांच वाहनों के ई-टीपी भी संलग्न किए हैं। अब इन दस्तावेजों और संबंधित वाहनों की आवाजाही के रिकॉर्ड का मिलान कराए जाने की मांग की जा रही है। हालांकि, आरोपों की पुष्टि आधिकारिक जांच के बाद ही हो सकेगी।
33 घंटे का पास, तीन-चार फेरे कैसे?
इस पूरे मामले का सबसे अहम पहलू ई-ट्रांजिट पास के कथित बार-बार इस्तेमाल से जुड़ा है। शिकायतकर्ताओं के अनुसार, रेत परिवहन के लिए जारी किए जाने वाले ई-टीपी की वैधता 33 घंटे बताई गई है। आरोप है कि इसी अवधि के दौरान एक ही पास का इस्तेमाल कर संबंधित डंपरों से तीन से चार बार तक रेत की ढुलाई कराई जा रही है।
यदि एक ही ई-टीपी पर कई बार परिवहन किए जाने की पुष्टि होती है, तो यह जांच का विषय होगा कि प्रत्येक फेरे के लिए नियमानुसार अलग परिवहन अनुमति या पास की आवश्यकता थी या नहीं, पोर्टल पर दर्ज विवरण क्या हैं और वास्तविक परिवहन की मात्रा कितनी रही। वाहन की आवाजाही, पास जारी होने का समय, परिवहन की प्रविष्टियां और खदान से निकली रेत की मात्रा का मिलान इस मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट कर सकता है।
शिकायतकर्ताओं का दावा है कि यह गतिविधि 14 अक्टूबर 2026 से शुरू हुई और इसके बाद बढ़ती गई। उन्होंने पांच वाहनों के ई-टीपी को प्रमाण के रूप में प्रस्तुत करने की बात कही है। इन दस्तावेजों की स्वतंत्र जांच और संबंधित वाहनों के रिकॉर्ड का सत्यापन होने पर ही यह स्पष्ट हो सकेगा कि पास का दोबारा इस्तेमाल हुआ या नहीं और यदि हुआ, तो उसका स्वरूप क्या था।
82 करोड़ की निविदा, पर्यावरणीय स्वीकृति 3.18 लाख घनमीटर
सीधी जिले में रेत खनन का ठेका मेसर्स शक्ति एंटरप्राइजेज को एमडीओ के रूप में आवंटित किए जाने की जानकारी दी गई है। शिकायत में बताया गया है कि 16 लाख घनमीटर वार्षिक रेत मात्रा के लिए 82 करोड़ रुपये की वार्षिक निविदा राशि निर्धारित की गई है। दूसरी ओर, वर्तमान में खदानों के लिए 3.18 लाख घनमीटर वार्षिक मात्रा की पर्यावरणीय स्वीकृति उपलब्ध होने का दावा किया गया है।
शिकायत के मुताबिक, इसी स्थिति के आधार पर एमडीओ को जबलपुर स्थित उच्च न्यायालय से अंतरिम राहत मिली है। इसके तहत उपलब्ध पर्यावरणीय स्वीकृति की मात्रा के अनुपात में लगभग 20 करोड़ रुपये वार्षिक राशि मध्यप्रदेश राज्य खनिज निगम को भुगतान किए जाने की बात कही गई है। यह राशि मूल निविदा राशि 82 करोड़ रुपये से काफी कम है।
हालांकि, निविदा राशि, पर्यावरणीय स्वीकृति, न्यायालय के आदेश और भुगतान की शर्तों के बीच वास्तविक संबंध को समझने के लिए संबंधित आदेश तथा अनुबंध का परीक्षण आवश्यक है। केवल इन राशियों के अंतर से राजस्व हानि सिद्ध नहीं होती। इसके लिए यह देखना होगा कि न्यायालय ने किन परिस्थितियों में अंतरिम राहत दी, भुगतान का आधार क्या तय किया गया और खनन तथा परिवहन की अनुमति किन शर्तों के अधीन है।
एआई चेकगेट लगे तो फिर कैसे हो रहा कथित खेल?
सीधी-रीवा और सीधी-मऊगंज मुख्य मार्गों पर खनिज विभाग द्वारा एआई आधारित चेकगेट और सीसीटीवी कैमरे स्थापित किए गए हैं। इन व्यवस्थाओं का उद्देश्य वाहनों की आवाजाही और खनिज परिवहन की निगरानी को मजबूत करना है। इसके बावजूद एक ही ई-टीपी पर कई बार रेत परिवहन किए जाने का आरोप सामने आने से निगरानी व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठ रहे हैं।
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि संबंधित चेकगेट के सीसीटीवी फुटेज, वाहन पंजीकरण नंबर और खनिज पोर्टल पर दर्ज ई-टीपी विवरण का एक साथ मिलान कराया जाए। जांच में यह देखा जा सकता है कि संबंधित वाहन किस समय चेकगेट से गुजरे, उनके पास कौन-सा ई-टीपी दर्ज था और क्या उसी पास का इस्तेमाल अलग-अलग फेरों के दौरान किया गया।
यदि इन रिकॉर्डों का व्यवस्थित मिलान होता है, तो आरोपों की पुष्टि या खंडन करने में मदद मिल सकती है। साथ ही यह भी स्पष्ट किया जा सकेगा कि निगरानी प्रणाली में किसी तकनीकी कमी, रिकॉर्ड दर्ज करने की त्रुटि या नियमों के कथित उल्लंघन की भूमिका रही है या नहीं।
पांच वाहनों के ई-टीपी देकर जांच की मांग
शिकायतकर्ताओं ने अपने आरोपों के समर्थन में पांच वाहनों के ई-टीपी संलग्न करने की बात कही है। उनका आग्रह है कि इन पासों को केवल कागजी दस्तावेज के रूप में देखने के बजाय इनके आधार पर वास्तविक परिवहन गतिविधियों की जांच की जाए।
इसके लिए ई-टीपी जारी होने और उसकी वैधता से संबंधित समय, वाहन की पहचान, खदान से निकासी का रिकॉर्ड, चेकगेट की प्रविष्टियां और संबंधित अवधि के सीसीटीवी फुटेज का मिलान महत्वपूर्ण होगा। यदि एक ही पास पर कई बार परिवहन किए जाने की पुष्टि होती है, तो यह भी निर्धारित करना होगा कि कितनी मात्रा में रेत का परिवहन हुआ और क्या उससे खनिज नियमों या लागू शर्तों का उल्लंघन हुआ।
शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि जांच का दायरा केवल संबंधित वाहनों तक सीमित न रहे, बल्कि ई-टीपी जारी करने, उसकी जांच करने और परिवहन की निगरानी से जुड़े रिकॉर्ड की भी पड़ताल की जाए। इससे यह पता लगाने में मदद मिलेगी कि कथित अनियमितता किसी व्यक्ति, वाहन या प्रक्रिया तक सीमित थी अथवा व्यवस्था में व्यापक खामी मौजूद थी।
करोड़ों की राजस्व हानि की आशंका, वसूली की मांग
शिकायत में शासन को करोड़ों रुपये की राजस्व हानि होने की आशंका जताई गई है। शिकायतकर्ताओं का कहना है कि यदि ई-टीपी के कथित दुरुपयोग से वास्तविक परिवहन की मात्रा और सरकारी रिकॉर्ड में दर्ज मात्रा के बीच अंतर पाया जाता है, तो संबंधित अवधि के खनन और परिवहन का विस्तृत आकलन कराया जाना चाहिए।
हालांकि, राजस्व हानि की वास्तविक राशि का निर्धारण जांच के बाद ही संभव होगा। इसके लिए परिवहन की मात्रा, लागू रॉयल्टी और अन्य देय शुल्क, ई-टीपी का रिकॉर्ड तथा संबंधित अनुबंध की शर्तों का परीक्षण करना जरूरी है। शिकायतकर्ताओं ने मांग की है कि अनियमितता प्रमाणित होने पर नियमानुसार राजस्व की वसूली की जाए और जिम्मेदार व्यक्तियों के विरुद्ध वैधानिक कार्रवाई हो।
प्रमुख सचिव और खनिज निगम से हस्तक्षेप की अपेक्षा
मामले की शिकायत उच्च स्तर तक पहुंचने की बात सामने आने के बाद अब संबंधित विभागों की भूमिका महत्वपूर्ण हो गई है। शिकायतकर्ताओं ने प्रमुख सचिव, खनिज साधन विभाग और मध्यप्रदेश राज्य खनिज निगम से मामले की निष्पक्ष जांच कराने की मांग की है। उनका कहना है कि जांच में ई-टीपी के दुरुपयोग, अवैध परिवहन या अन्य अनियमितताओं की पुष्टि होने पर संबंधित एमडीओ, जिम्मेदार अधिकारियों और अन्य संलिप्त व्यक्तियों के विरुद्ध खनिज नियमों के तहत कार्रवाई की जाए।
इस मामले में संबंधित ठेकेदार और खनिज विभाग का आधिकारिक पक्ष सामने आना भी जरूरी है। फिलहाल उपलब्ध शिकायत संबंधी विवरण के आधार पर आरोपों को प्रमाणित तथ्य नहीं माना जा सकता। ई-टीपी रिकॉर्ड, सीसीटीवी फुटेज, चेकगेट की प्रविष्टियों और संबंधित न्यायालयीन आदेशों की जांच के बाद ही पूरे मामले की वास्तविक स्थिति स्पष्ट होगी।
अब जांच से तय होगा सच
सीधी जिले में रेत परिवहन से जुड़ा यह मामला ई-टीपी प्रणाली, खनिज परिवहन की निगरानी और सरकारी राजस्व की सुरक्षा से संबंधित है। यदि एक ही पास पर कई बार परिवहन किए जाने का आरोप सही पाया जाता है, तो यह व्यवस्था की निगरानी और नियमों के अनुपालन को लेकर गंभीर सवाल खड़े करेगा। वहीं, रिकॉर्ड में किसी प्रकार की त्रुटि या गलतफहमी सामने आने पर उसकी वास्तविक वजह भी स्पष्ट हो सकेगी। ऐसे में निष्पक्ष जांच, दस्तावेजों का सत्यापन और संबंधित पक्षों का जवाब इस पूरे प्रकरण में निर्णायक होंगे।




