रीवा। अपना घर हर परिवार का सपना होता है लेकिन जब वर्षों से किसी सरकारी जमीन पर रह रहे परिवार के पास उस जमीन का वैध पट्टा या स्वामित्व संबंधी दस्तावेज नहीं हो, तो उसका जीवन अनेक अनिश्चितताओं के बीच गुजरता है। रीवा में ऐसे भूमिहीन परिवारों की समस्या एक बार फिर चर्चा में है। सरकारी जमीन पर निवास कर रहे अनेक परिवार आवासीय पट्टे की उम्मीद लगाए बैठे हैं लेकिन भूमि के राजस्व अभिलेखों में आबादी क्षेत्र के रूप में दर्ज नहीं होने के कारण उनके सामने पात्रता और कानूनी प्रक्रिया की बाधा खड़ी हो रही है। बता दें कि स्वामित्व योजना के तहत जिले के 21899 परिवारों को पट्टा लाभ मिला है लेकिन जरूरतमंद परिवारों की संख्या इससे लगभग ढ़ाई गुना है। इस परिस्थिति में सरकार की इस महत्वपूर्ण योजना का लाभ अधिकाधिक पात्र परिवारों तक पहुंचाने के लिए रीवा में विशेष सर्वेक्षण, भूमि की श्रेणीवार पहचान और वैकल्पिक आवासीय भूमि उपलब्ध कराने की दिशा में पहल की जा सकती है। एक अनुमान के मुताबिक अभी भी 50 हजार से अधिक ऐसे परिवार हैं जो सरकारी भूमि में वर्षो से निवास कर रहे हैं लेकिन उनको पट्टा सिर्फ इसलिए नहीं मिल सकता क्योंकि वह आबादी क्षेत्र नहीं है। उदाहरण के लिए हाल ही में ग्राम सगरा में हुए प्रशासनिक सर्वे में 93 हितग्राहियों को पट्टा के पात्र पाया गया लेकिन 200 से अधिक परिवार ऐसे मिले जो सरकारी भूमि में निवास करते हैं लेकिन वह आबादी क्षेत्र नहीं होने से उनको पट्टा नहीं दिया जा सकता है।
आबादी क्षेत्र में दर्ज नहीं हैं कई बस्तियां
समस्या का प्रमुख कारण यह बताया जा रहा है कि रीवा में सरकारी जमीन पर बसे कई परिवार ऐसी भूमि पर निवास कर रहे हैं, जो राजस्व अभिलेखों में आबादी क्षेत्र के रूप में दर्ज नहीं है। कुछ परिवार तालाबों के आसपास, पहाड़ी भूमि, आम रास्ता अथवा विभिन्न सरकारी परियोजनाओं के लिए अधिग्रहित जमीनों पर बसे हुए हैं। जिससे इनको उक्त भूमि का पट्टा नहीं दिया जा सकता है। इसके लिए या तो प्रशासन ऐसी बस्तियों का सर्वे कराए या फिर भूमि को आबादी क्षेत्र में दर्ज किया जाए। रीवा जिले में अधिकतर क्षेत्रों में यहीं स्थिति है, शायद यही वजह भी है कि रीवा जिले में प्रदेश के अन्य जिलों के मुताबिक पट्टा लाभ हितग्राहियों की संख्या काफी कम है। हालांकि मामले को जिम्मेदार अधिकारियों द्वारा शासन स्तर पर पहुंचाने का कार्य शुरु कर दिया गया है। ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्यमंत्री आवासीय भू-अधिकार योजना के तहत पात्र परिवारों को आबादी क्षेत्र की भूमि पर आवासीय भूखंड उपलब्ध कराने का प्रावधान है। ऐसे में जिन परिवारों की बस्ती आबादी क्षेत्र से बाहर है, उनके मामलों में भूमि की श्रेणी, स्वामित्व, उपयोग और संबंधित नियमों की जांच किए बिना सीधे पट्टा देना संभव नहीं माना जा सकता।
योजना के बाद कलेक्ट्रेट के लगा रहे चक्कर
केंद्र सरकार की स्वामित्व योजना की जानकारी होते ही अब सरकारी जमीन में निवासरत हितग्राही पट्टे के लिए दौड़ लगा रहे हैं, वह कलेक्ट्रेट कार्यालय के चक्कर काट रहे हैं। बता दें कि योजना का प्रमुख उद्देश्य ग्रामीण आबादी क्षेत्रों में संपत्तियों का ड्रोन तकनीक से सर्वेक्षण कराकर उनकी सीमाएं निर्धारित करना और पात्र संपत्ति धारकों को अधिकार अभिलेख उपलब्ध कराना है। इस योजना के माध्यम से संपत्ति संबंधी विवाद कम करने, भूमि अभिलेख स्पष्ट करने और संपत्ति को आर्थिक संपत्ति के रूप में उपयोग करने में मदद मिलती है लेकिन स्वामित्व योजना का उद्देश्य प्रत्येक सरकारी जमीन पर बसे व्यक्ति को स्वत: नया पट्टा देना नहीं है। ग्रामीण क्षेत्रों में मुख्यमंत्री आवासीय भू-अधिकार योजना के अंतर्गत पात्र परिवारों को आबादी भूमि पर आवासीय भूखंड उपलब्ध कराने की व्यवस्था है।
परिवारों के लिए अलग समाधान जरूरी
रीवा में जिन परिवारों के पास रहने के लिए जमीन नहीं है, उनमें से कुछ ऐसे स्थानों पर रह रहे हो सकते हैं जहां सीधे पट्टा देना जनहित या पर्यावरण की दृष्टि से उचित नहीं होगा। उदाहरण के लिए, तालाबों के जलग्रहण क्षेत्र, जल निकासी मार्ग, संरक्षित भूमि या सार्वजनिक उपयोग के लिए आरक्षित जमीन पर स्थायी आवासीय अधिकार देने से दूसरी समस्याएं पैदा हो सकती हैं। इसी तरह किसी सरकारी परियोजना के लिए अधिग्रहित भूमि पर पट्टा देने से पहले संबंधित अधिग्रहण और उपयोग संबंधी अभिलेखों की जांच जरूरी होगी। ऐसी स्थिति में परिवारों को केवल अपात्र घोषित कर छोड़ देना भी समस्या का स्थायी समाधान नहीं होगा। प्रशासन को यह देखना चाहिए कि क्या उसी क्षेत्र के आसपास कोई दूसरी उपयुक्त सरकारी भूमि उपलब्ध हैए जहां नियमानुसार आवासीय भूखंड विकसित किए जा सकते हैं। यदि मूल स्थान पर पट्टा देना संभव नहीं है, तो पात्र परिवारों के लिए वैकल्पिक भूमि, पुनर्वास अथवा आवास योजना के माध्यम से सहायता देने की संभावनाओं का परीक्षण किया जा सकता है। इस तरह एक ओर तालाबों, पहाडिय़ों और सार्वजनिक उपयोग की भूमि की सुरक्षा बनी रहेगी, वहीं दूसरी ओर जरूरतमंद परिवारों को सुरक्षित आवास उपलब्ध कराने का रास्ता भी निकल सकेगा। इस समस्या के समाधान की दिशा में पहला कदम जिले में व्यापक और पारदर्शी सर्वेक्षण होना चाहिए।
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स्वामित्व योजना सहित अन्य योजनाओं के तहत भूमिहीनों को अधिकार दिया जा रहा है। जहां पर ऐसी समस्या हैं वहां पर मंथन किया जा रहा है व इस संबंध में शासन को अवगत भी कराया जा रहा है। शासन की योजना का लाभ हर जरूरत मंदो तक पहुंचे, पूरा प्रयास किया जा रहा है।
नरेन्द्र कुमार सूर्यवंशी, कलेक्टर रीवा।
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