NAGAR NIGAM REWA: Demand for investigation from the Collector in the Bansagar Talaiya building permission case, dissatisfaction with the working style of the Municipal Commissioner…
रीवा। नगर निगम के नवागत आयुक्त की कार्यप्रणाली पर भी अब सवाल खड़ा किया जाने लगा। आवेदनों पर कार्यवाही न होने से नाराज आवेदक अब कलेक्टर की चौखट पर गुहार लगा रहे हैं। निगम में शिकायतों को अनसुना किए जाने व गलत करने वालों को कथित अभयदान दिए जाने का दौर एक बार फिर चल पड़ा है। ऐसा हम नहीं अब आमजन के बीच चर्चाओं में कहा जाने लगा है। कलेक्टर से शिकायत में कहा गया है कि निगमायुक्त अक्षत जैन सिर्फ जांच का आश्वासन दे रहे हैं लेकिन यह जांच पूरी नहीं हो पा रही है। यह भी एक गंभीर विषय है। बता दें कि बाणसागर तलैया भवन अनुज्ञा जो कि तत्कालीन सहायक यंत्री अंबरीश सिंह ने अपने सेवानिवृत्त के पहले विश्वनाथ सिंह को दी थी। मामले की शिकायत अब कलेक्टर से की गई है।
मामले में कलेक्टर से जांच कराकर कार्यवाही की मांग की गई है। अधिवक्ता मानवेन्द्र द्विवेदी ने शिकायत करते हुए कहा है कि आम जन के बीच यह भी चर्चा है कि आयुक्त उक्त मामले में किसी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं करना चाहते हैं। आवेदक ने कहा कि बीते 12 मई को उनके द्वारा शिकायत की गई थी, तब अधिकारियों ने जानकारी दी थी कि उक्त मामले में विधिक राय ली जा रही है, लॉ आफिसर ने भी लिखकर दस्तावेजों की जांच की बात कही है, साथ ही समाचार पत्रों के माध्यम से अधिवक्ताओं ने भी उक्त मामले में अपना पक्ष रखा है और दस्तावेजों में छेड़छाड़ को बिल्कुल गलत बताया लेकिन 16 दिन बीत जाने के बाद भी किसी प्रकार की कार्यवाही निगम प्रशासन द्वारा नहीं की गई।
अधिवक्ता ने शिकायत में यह कहा…
अधिवक्ता मानवेन्द्र द्विवेदी ने कलेक्टर रीवा से शिकायत में कहा है बीते 30 दिसंबर 2025 को नगर निगम के सहायक यंत्री अंबरीश सिंह द्वारा अपने सेवानिवृत्त के ठीक एक दिन पहले बाणसागर स्थित आराजी क्रमांक 631/2 रकवा 0.4050 है. में से 2030 वर्गमीटर रकवा मौजा समान पटवारी हल्का समान तहसील हुजूर में विश्वनाथ सिंह पिता रामजी सिंह निवासी वार्ड क्रमांक 25 समान रीवा को मंजूरी दी गई है। जबकि इस भूमि को सरकारी मानते हुए प्रशासन द्वारा हाईकोर्ट में याचिका दायर की गई है। जानकारी के मुताबिक तत्कालीन कलेक्टर प्रतिभा पाल ने मामले में नोडल अधिकारी तत्कालीन निगम कमिश्रर डॉ.सौरभ सोनवणे को बनाया था और उन्होंने ही याचिका भी दायर कराई लेकिन उन्हीं के कार्यकाल में उन्हें के अधिनस्थ रहे एसडीओ अंबरीश सिंह ने एक दिन पहले भवन अनुज्ञा उक्त खसरे के कुछ हिस्से में जारी कर दी। अनुज्ञा को देने के लिए एसडीओ ने प्रशासन के दावे को तो दरकिनार किया ही है बल्कि फर्जी दस्तावेजों को भी मान्य किया गया, इस अनुज्ञा के लिए जो 21 बिंदुओ का शपथ पत्र आवेदक विश्वनाथ सिंह द्वारा प्रस्तुत किया गया है, इस शपथ पत्र को नोटरी 2 जून 2021 में किया गया था, इतना ही नहीं नोटरी करने वाले अनिल श्रीवास्तव ने जो सील लगाई है, उसमें उनके पंजीयन की वैधता भी 12 दिसंबर 2023 की ही है लेकिन इस शपथ पत्र को प्रस्तुत किया गया 8 नवंबर 2025 की तारीख डालकर, जबकि तारीख 2 जून 2021 की होनी चाहिए। जबकि कोई भी शपथ पत्र बनने के बाद 6 माह बाद तक ही उपयोग किया जा सकता है और शपथ पत्र में अलग-अलग दिनांक फर्जीवाड़े का दर्शाता है। इसके साथ ही लैंडयूज, खसरा सहित टैक्स रहवासी का काटा गया लेकिन प्लॉट खाली बताते हुए अनुज्ञा जारी की गई।
तत्कालीन निगमायुक्त ने अनुज्ञा निरस्त करने दिए थे आदेश
शिकायत में मानवेन्द्र द्विवेदी ने बताया है कि तत्कालीन निगम आयुक्त डॉ.सौरभ सोनवणे को मामले की शिकायत मेरे द्वारा की गई थी, उन्होंने तत्काल कार्यपालन यंत्री सिद्धार्थ सिंह को भवन अनुज्ञा निरस्त करने हेतु आदेशित किया गया था लेकिन इसी बीच उनका तबादला आदेश जारी हो गया और वह अगले दिन बैतूल चले गए। वर्तमान निगमायुक्त अक्षत जैन को भी मामले की शिकायत की गई है लेकिन उनके द्वारा मामले में अब तक किसी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं की गई। जबकि फर्जी दस्तावेजों के आधार पर भवन अनुज्ञा जारी किया जाना स्पष्ट है। आयुक्त जांच कराए जाने की बात लंबे समय से कर रहे हैं, जिससे उनकी कार्यप्रणाली पर भी अब सवाल खड़ा किया जा रहा है। आमजन के बीच चर्चा है कि आयुक्त उक्त मामले पर किसी प्रकार की कोई कार्यवाही नहीं करना चाहते, अधिवक्ता ने कहा कि मामले की जांच कराकर कार्यवाही की जाए ताकि प्रशासन के दावे अनुसार उक्त सरकारी भूमि को बचाया जा सके। यदि कार्यवाही नहीं होती है नो उक्त भूमि में भवन निर्माण करा लिया जाएगा, जिसे गिराना भविष्य में और मुश्किल होगा। वर्तमान में निगम की जांच के दौरान ही निर्माणकर्ता द्वारा दिन रात कार्य कराया जा रहा है और काफी गति से निर्माण हो रहा है।
कंसल्टेंट चला रहे अधिकारियों की आईडी
बता दें कि इस फर्जीवाड़े के बीच एक और मामले को लेकर निगम कार्यालय में चर्चाएं तेज हैं, कहा जा रहा है कि इस तरह के फर्जीवाड़ों का एक मुख्य कारण यह भी है कि नगर निगम अधिकारियों की आईडी को कुछ कंसल्टेंट भी चलाते हैं, अधिकारियों ने अपनी आईडी पासवर्ड इन्हें दे रखे हैं और वह कभी कभार ही फाइले देखते हैं, यह कंसल्टेंट अपने करीबी कंसल्टेंटों के लिए नियमों को ताक पर रख रहे है तो जो उनकी जी हूजूरी नहीं करता उसका काम रोक देते हैं और अधिकारियों को गलत जानकारी देते हैं। हालांकि निगमायुक्त ने नगर निगम का प्रभार संभालते ही भवन अनुज्ञा मामलो में सख्ती तो दिखाई थी लेकिन बाद में इस ओर अब ध्यान नहीं दिया जा रहा है। अब ऐसे मामलो की जांच हो तो सामने आए कि आखिर कौन कौन से ऐसे अधिकारी हैं जो शासकीय आईडी पासवर्ड प्राइवेट हाथों में दे रखे हैं।
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