Hindi Journalism Day: The foundation of journalism was laid in Vindhya 200 years ago.
रीवा। आज हिंदी पत्रकारिता दिवस है। आज से 200 साल पूर्व 1886 में कलकत्ता में हिंदी पत्रकारिता दिवस मनाने की नींव रखी गई थी। उल्लेखनीय है कि अगले साल विंध्य में भी हिंदी पत्रकारिता का बीजारोपण हुआ था। इस तरह विंध्य में भी पत्रकारिता का 200 साल का सफर पूरा होने जा रहा है। रीवा की पत्रकारिता केवल सूचना का माध्यम नहीं, बल्कि समाज की चेतना और परिवर्तन की शक्ति रही है। आजादी की लड़ाई से लेकर वर्तमान में विकास के हर सोपान में लोकतंत्र के प्रहरी की भूमिका विंध्य की पत्रकारिता ने बखूबी निभाया है और निभा रहे हैं। शुरुआत 1887 में भारतभ्राता अखबार से हुई। इसके बाद कई अखबार आए। 1953 के पहले विंध्य के सभी अखबार साप्ताहिक पत्र-पत्रिकाएं रहे। पहली बार 1953 में दैनिक अखबार के रूप में दैनिक जागरण आया और विंध्य की पत्रकारिता को नया आयाम मिला। रीवा में हिंदी पत्रकारिता की विकास यात्रा को लेकर पंडित गोविंद बल्लभ पंत तथा भारतेंदु हरिश्चंद्र अवार्ड से सम्मानित प्रोफेसर अखिलेश शुक्ल ने अपने आलेख में लिखा है कि बघेलखंड, विशेषकर रीवा की पत्रकारिता का इतिहास भी इसी गौरवशाली परंपरा का प्रतीक है। यहां की पत्रकारिता ने स्वतंत्रता आंदोलन से लेकर आधुनिक सामाजिक, सांस्कृतिक और राजनीतिक जागरण तक महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।
राष्ट्रीय चेतना की अलख जगाने वाली पत्रकारिता: प्रो शुक्ल कहते हैं कि बघेलखंड में पत्रकारिता की सशक्त शुरुआत 1 अप्रैल 1887 को रीवा से प्रकाशित ‘भारत भ्राताÓ समाचार पत्र से मानी जाती है। इसके संपादक रीवा स्टेट आर्मी के सेनाध्यक्ष लाल बलदेव सिंह थे। यह मध्यप्रदेश क्षेत्र का प्रथम राष्ट्रीय चेतना से प्रेरित समाचार पत्र माना गया, जिसने अंग्रेजी शासन के विरुद्ध जनभावनाओं को अभिव्यक्ति दी। स्वतंत्रता संग्राम सेनानी पं. मदन मोहन मालवीय ने भी इसकी निर्भीक पत्रकारिता की सराहना की थी। इसकी लोकप्रियता और राष्ट्रवादी विचारों से चिंतित होकर ब्रिटिश सरकार ने वर्ष 1902 में इसका प्रकाशन बंद करा दिया। इसके बाद वर्ष 1910 में पं. रघुवर प्रसाद शास्त्री द्वारा प्रकाशित ‘शुभचिंतकÓ साप्ताहिक पत्र ने भी सामाजिक जागृति और राष्ट्रीय भावना को मजबूत किया, जिसे 1918 में अंग्रेजी सरकार द्वारा बंद करा दिया गया।
स्वतंत्रता आंदोलन में समाचार पत्रों की भूमिका
वर्ष 1932 में प्रकाशित ‘प्रकाशÓ साप्ताहिक पत्र ने बघेलखंड में पत्रकारिता को नई ऊंचाई प्रदान की। इसके प्रथम संपादक नरसिंहराम शुक्ल थे। पत्र का उद्देश्य था ‘ग्राम-ग्राम, धाम-धाम, फैले मधुर प्रकाशÓ स्वतंत्रता आंदोलन में सक्रिय भूमिका के कारण नरसिंहराम शुक्ल को अंग्रेजी शासन द्वारा गिरफ्तार भी किया गया।
इसी कालखंड में ‘मानसमणिÓ, ‘बान्धवÓ जैसी साहित्यिक पत्रिकाओं ने भाषा, साहित्य और सांस्कृतिक चेतना को आगे बढ़ाया। वर्ष 1946 में पं. शंभूनाथ शुक्ल द्वारा प्रारंभ ‘साप्ताहिक भास्करÓ ने भी क्षेत्रीय पत्रकारिता को नई पहचान दी।
स्वतंत्र भारत में सामाजिक सरोकारों की आवाज
प्रो अखिलेश शुक्ल ने अपने आलेख में उद्धृत किया है कि आजादी के बाद बघेलखंड की पत्रकारिता ने समाज निर्माण की भूमिका निभाई। वर्ष 1950 में ‘किसान पंचायतÓ ने किसानों और ग्रामीण समाज की समस्याओं को प्रमुखता दी। इसके बाद ‘विंध्य शिक्षाÓ, ‘नवज्योतिÓ, ‘विंध्यवार्ताÓ और ‘विंध्य प्रदेशÓ जैसे प्रकाशनों ने शिक्षा, प्रशासन और सामाजिक मुद्दों को मंच प्रदान किया। सितंबर 1953 में विंध्य क्षेत्र के पहले दैनिक समाचार पत्र के रूप में ‘दैनिक जागरणÓ का प्रकाशन प्रारंभ हुआ। इसके बाद ‘गरीबÓ, ‘विंध्य पंचायतÓ, ‘विंध्य भारतीÓ, ‘उदयÓ, ‘धरतीÓ, ‘बांधवीय समाचारÓ, ‘रीवा टाइगरÓ, ‘कीर्ति क्रांतिÓ, ‘राजरथÓ और ‘विंध्य भारतÓ जैसे अनेक समाचार पत्रों ने क्षेत्रीय पत्रकारिता को समृद्ध बनाया।
समर्पित पत्रकारों की गौरवशाली परंपरा- बघेलखंड की पत्रकारिता को ऊंचाइयों तक पहुंचाने में लाल बलदेव सिंह, नरसिंहराम शुक्ल, ठाकुर अर्जुन सिंह, पं. शंभूनाथ शुक्ल, जागेश्वर प्रसाद पाण्डेय, गुरुदेव गुप्त, जगदीश चन्द्र जोशी, राजीव लोचन अग्निहोत्री, सुशीलचन्द्र दीक्षित सहित अनेक पत्रकारों का उल्लेखनीय योगदान रहा। इन पत्रकारों ने सीमित संसाधनों के बावजूद निर्भीक लेखनी से सामाजिक अन्याय, प्रशासनिक विसंगतियों और जनसमस्याओं को सामने रखा। उनकी पत्रकारिता केवल समाचार तक सीमित नहीं रही, बल्कि समाज सुधार का प्रभावी माध्यम बनी।
आकाशवाणी और दूरदर्शन से संस्कृति को मिला स्वर: आपने बताया कि प्रिंट मीडिया के साथ रीवा में इलेक्ट्रॉनिक मीडिया ने भी महत्वपूर्ण योगदान दिया। 17 अक्टूबर 1977 को स्थापित आकाशवाणी रीवा ने बघेलखंड की लोक संस्कृति, लोकगीतों, कृषि, महिला सशक्तिकरण और ग्रामीण जीवन को व्यापक पहचान दी। ‘चौपालÓ, ‘घर-आंगनÓ, ‘युववाणीÓ और लोक संगीत आधारित कार्यक्रम आज भी क्षेत्रीय संस्कृति के संवाहक हैं। वर्ष 1984 में स्थापित दूरदर्शन अनुप्रसारण केंद्र ने भी सूचना, शिक्षा और मनोरंजन के माध्यम से क्षेत्रीय समाज को राष्ट्रीय प्रवाह से जोड़ा।
डिजिटल युग में नई संभावनाएं
आज पत्रकारिता प्रिंट से आगे बढ़कर डिजिटल प्लेटफॉर्म तक पहुंच चुकी है। सोशल मीडिया और ऑनलाइन माध्यमों ने संवाद की गति बढ़ाई है, लेकिन निष्पक्षता, सत्यता और सामाजिक जिम्मेदारी की आवश्यकता पहले से अधिक महत्वपूर्ण हो गई है।
बघेलखंड की पत्रकारिता का इतिहास यह प्रमाणित करता है कि यहां की लेखनी ने केवल खबरें नहीं लिखीं, बल्कि समाज की चेतना, संघर्ष और संस्कृति का इतिहास भी रचा। यह परंपरा आने वाली पीढिय़ों के लिए प्रेरणा स्रोत बनी रहेगी।




