2 crore 59 lakh rupees were also recovered from APS University, the administration has not yet given the land.
रीवा। कलेक्टर के आदेश का मखौल कैसे उड़ाया जा सकता है, यह राजस्व अमले से सीखना चाहिए। कलेक्टर ने 30 नवम्बर 2019 को अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय को करीब 6 एकड़ भूमि का आधिपत्य सौंपने का आदेश दिया था। अनुविभागीय अधिकारी को तब उक्त आदेश में 15 दिन में कार्यवाही करने हेतु आदेशित किया गया था। लेकिन भू-अर्जन अधिनियम 1896 की धारा 16 के तहत आज तक अनुविभागीय अधिकारी कब्जा प्राप्त कर विश्वविद्यालय को आधिपत्य नहीं दे सके। जबकि इसके लिए विश्वविद्यालय द्वारा 2 करोड़ 59 लाख रूपये मुआवजा वर्ष नवम्बर 2017 में दिया जा चुका है। विश्वविद्यालय की भूमि पर 13 अवैध कब्जाधारियों में से 6 ने मुआवजा प्राप्त भी कर लिया है। फिर भी संबंधितजन विश्वविद्यालय की भूमि पर निरंतर अवैध निर्माण करा रहे हैं और राजस्व अमला समेत जिला प्रशासन नि:शक्त बना हुआ है। हालाकि तत्कालीन कलेक्टर डॉ इलैयाराजा टी के रहते राजस्व अमले ने इस मसले को लेकर कुछ कान-पूछ हिलाया था। अवैध कब्जाधारियों को भूमि खाली करने मार्च 2020 और नवम्बर 2020 में नोटिस जारी हुए। अंतिम नोटिस गत 31 जनवरी 2022 को जारी हुई, जिसमें 15 फरवरी तक भूमि खाली करने के निर्देश दिए गए, परंतु इन कागजी कार्यवाही से अवैध कब्जाधारियों को कोई फर्क नहीं पड़ा।
कुलसचिव लगातार लिख रहे पत्र
मामले को लेकर विश्वविद्यालय कुलसचिव ने विगत कई वर्षो से लगातार कलेक्टर को पत्र लिखा जा रहा है, जिसमें उक्त भूमि विश्वविद्यालय के नाम हस्तांतरण करने के लिए कहा गया है। ताकि विश्वविद्यालय के प्रस्तावित विकास कार्य समय पर पूर्ण हो सके। साथ ही, विश्वविद्यालय की सीमा निर्धारण के लिए बाउण्ड्रीवाल का निर्माण कराया जा सके। हालांकि इस पर कोई कार्यवाही नहीं की जा रही है।
कलेक्टर के आदेश पर जमा हुई राशि
गौरतलब है कि विश्वविद्यालय एमबीए भवन के पीछे की भूमि अधिग्रहीत करने राशि देने की सहमति सितम्बर 2017 में कार्यपरिषद बैठक में बनी थी। तब कार्यपरिषद के कहने के पर विश्वविद्यालय प्रशासन ने उक्त राशि भू-अर्जन अधिकारी कलेक्टर के खाते में जमा करा दी। विश्वविद्यालय द्वारा दी गई राशि को जिला प्रशासन ने 6 अतिक्रमणकारियों को बतौर मुआवजा वितरित कर दिया। बताते हैं कि एमबीए भवन के पीछे की तकरीबन 6 एकड़ भूमि विश्वविद्यालय की ही है परंतु राजस्व के दस्तावेज में किसी अन्य का नाम है। लिहाजा संबंधित व्यक्तियों द्वारा उक्त जमीन को खुर्द-बुर्द कर दिया। अतिक्रमण के अलावा संबंधितों ने उक्त भूमि की खरीद फरोख्त भी बड़े पैमाने पर की, जिसमें राजस्व अमले के भी कुछ लोग शामिल हैं।
वर्ष 2008 में पारित हुआ अवार्ड
मामले में बताया जाता हैं कि वर्ष 2003 में विश्वविद्यालय प्रशासन ने भूमि का एस्टीमेट बनाकर 14 लाख रुपये राजस्व विभाग को अदा किए, लेकिन दस्तावेजों में भूमि विश्वविद्यालय के नाम नहीं चढ़ सकी। जबकि विगत 21 मई 2008 को भू-अर्जन अधिनियम के तहत अवार्ड पारित किया जा चुका है। इधर, वर्ष 2014 में विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने 10 लाख रुपये देकर उक्त भूमि विश्वविद्यालय के नाम कराने पर स्वीकृति दी, जिसका भुगतान 14 लाख मिलाकर कर दिया गया। इसके बाद भी अधिकारियों की लापरवाही के कारण भूमि विश्वविद्यालय के नाम नहीं हो सकी। आखिर में उक्त राशि की ब्याज सहित 2 करोड़ 23 लाख 56 हजार रूपये विश्वविद्यालय ने वर्ष 2018 में जमा कराये, फिर भी हासिल शून्य है।
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