शहर को बीते ढाई दशक से विकास के नाम पर अंधी दौड़ में दौड़ाया जा रहा है। शहर में न तो ड्रेनेज सिस्टम का पता है और न ही नालों के चौड़ीकरण की कोई ठोस व्यवस्था दिखाई देती है। नगर को विकसित करने का दम भरने वाला नगर निगम आए दिन मानकों को ताक पर रखकर नालों के किनारे और निचले भूभाग में मल्टीस्टोरी बिल्डिंगों को अनुमति देता रहा है। बिल्डर ऊंची-ऊंची इमारतें तानते रहे और शहर का प्राकृतिक जल निकासी तंत्र सिकुड़ता गया। इस विकास से गरीब और मध्यमवर्गीय परिवार का दूर-दूर तक कोई लेना-देना नहीं है।
विकास की इस अंधी दौड़ को इस बार भगवान इंद्रदेव ने बादलों के माध्यम से आईना दिखाया है। झमाझम बारिश ने शहर के 80 प्रतिशत मोहल्लों को एक तरह से अपने आगोश में ले लिया। कई इलाकों में लोगों के दो मंजिला मकानों तक पानी पहुंच गया। सड़कें नदियों में तब्दील हो गईं और नालों का पानी घरों में घुस गया।
अब सवाल यह है कि इस डूबते शहर का जिम्मेदार कौन है?
ढाई दशक में महज डेढ़ साल को छोड़ दिया जाए तो भाजपा की ही सरकार रही है। इस बार नगर सरकार जरूर कांग्रेस के हाथ में है, लेकिन जिला, राज्य और केंद्र तक में एक ही पार्टी की सरकार है। पार्षद से लेकर विधायक, सांसद और मंत्री तक यहां से हैं। इसके बावजूद माननीयों के गढ़ के रूप में पहचान रखने वाला शहर का अमहिया मोहल्ला नाले में उफान के कारण संकट में रहा। यहां रहने वाले लोग अब भगवान से प्रार्थना कर रहे हैं—हे इंद्रदेव, तुम शांत हो जाओ और अपने बेरहम बादलों की सेना को रोक लो।
जनता सवाल कर रही है कि इस कृत्रिम बाढ़ का जिम्मेदार कौन है और जलप्रलय जैसी स्थिति में वह क्यों मौन है?
यह रीवा की विडंबना ही रही है कि यहां किसी एक व्यक्ति के इशारे पर हर काम होने की चर्चा आम है। बच्चे-बच्चे की जुबान पर यह बात सुनी जा सकती है कि माननीय के इशारे के बिना शहर का पत्ता भी नहीं हिलता। बीते तीन बार नगर निगम में उन्हीं के इशारे पर महापौर की कुर्सी मिलती रही। इसके बावजूद शहर का यह हाल समझ से परे है।
हालात से परेशान जनता ने नगर निगम की कुर्सी में बदलाव किया और ऐसी स्थिति बनी कि नगर सरकार विपक्ष के पास चली गई। लेकिन सत्ता बदलने के बाद भी आमजन को राहत नहीं मिली। नई नगर सरकार भी उसी पुराने ढर्रे पर चल पड़ी। आरोप लगने लगे कि कामकाज में पुरानी व्यवस्था और कथित सांठगांठ का असर बरकरार है। यानी कुर्सी बदली, लेकिन शहर की तकदीर नहीं बदली।
आखिर माननीयों ने 20 सालों में ऐसा प्लान क्यों नहीं तैयार कराया, जिससे शहर को डूबने से बचाया जा सके? ऐसी व्यवस्था क्यों नहीं बनाई गई कि बारिश का पानी कुछ घंटों में नालों और प्राकृतिक जल निकासी मार्गों से बाहर निकल जाए?
यह स्थिति क्यों बनी कि एक घंटे की बारिश में ही नेहरू नगर, तिलक नगर, समान जैसे मोहल्ले पानी में डूबने लगते हैं? आखिर हर बारिश में शहर की यही कहानी क्यों दोहराई जाती है?
जनता इन सवालों का जवाब चाहती है। हालांकि उसे जवाब नहीं मिल रहा है। ऐसे में जनता बादलों को कोस रही है—
“ये बेरहम बादलों, तुम तो तरस खाओ… क्योंकि शहर का विकास करने वाले तो शहर को डुबाने पर आमादा हैं।”




