रीटायरमेंट की तारीख आई, सरकारी सेवा खत्म हुई… लेकिन कुर्सी ने शायद कह दिया—“इतनी जल्दी भी क्या है साहब, अभी तो उम्र बाकी है!”
युवा नौकरी के लिए परीक्षा दे रहे हैं, फार्म भर रहे हैं, फीस जमा कर रहे हैं, सालों किताबों में सिर खपा रहे हैं। उधर सरकारी कुर्सियां भी बड़ी समझदार हैं—उन्हें पुराने चेहरों की आदत जो पड़ गई है!
संजय गांधी अस्पताल में सेवानिवृत्त चिकित्सक की संविदा पर वापसी ने फिर वही सवाल खड़ा कर दिया—क्या सरकारी कुर्सियों को भी पुराने अनुभव की ऐसी लत लग गई है कि नए चेहरे दिखाई ही नहीं देते?
अनुभव बुरा नहीं है। बल्कि अनुभव तो पूंजी है। लेकिन साहब, नई पीढ़ी को अनुभव मिलेगा कैसे? उसे भी कभी कुर्सी पर बैठने दिया जाएगा या जिंदगीभर यही समझाया जाएगा कि पहले अनुभव लाओ?
और मजे की बात देखिए—नौकरी के लिए युवा कहता है, “एक मौका दे दीजिए।”
व्यवस्था कहती है—“अनुभव नहीं है।”
रिटायर व्यक्ति लौटता है तो व्यवस्था कहती है—“अनुभव बहुत है, आइए बैठिए!”
अब युवा बेचारा पूछ रहा है—“साहब, अनुभव लेने के लिए कुर्सी चाहिए और कुर्सी के लिए अनुभव… तो शुरुआत कहां से करें?”
बात किसी एक डॉक्टर की नहीं है। बात उस सोच की है जिसमें रिटायरमेंट के बाद भी सरकारी कुर्सी का दरवाजा खुला रहता है, लेकिन नौकरी की उम्र वाला युवा दरवाजे के बाहर फाइल लेकर खड़ा रहता है।
अगर किसी सेवानिवृत्त चिकित्सक की सेवाएं वास्तव में जरूरी हैं तो जरूर ली जाएं। मगर कारण भी बताया जाए, प्रक्रिया भी बताई जाए और यह भी बताया जाए कि नई पीढ़ी के लिए रास्ता कहां है।
वरना एक दिन ऐसा न हो कि सरकारी दफ्तरों के बाहर बोर्ड लगाना पड़े—
“युवाओं का प्रवेश वर्जित है, यहां अनुभवधारी रिटायर्डों के लिए सीट आरक्षित है!”
और कुर्सी मुस्कुराकर कहे—
“रिटायरमेंट आपकी हो सकती है साहब… मेरी नहीं!”
— संपादक, विंध्य वाणी




