विश्वविद्यालय में कुलपति का पद सिर्फ प्रशासनिक कुर्सी नहीं, बल्कि पूरे संस्थान की गरिमा और विश्वास का प्रतीक होता है। ऐसे में पूर्व कुलपति से जुड़ा बताया जा रहा वीडियो और शोधार्थी छात्रा को लेकर सामने आ रहे गंभीर दावे महज इंटरनेट मीडिया की सनसनी मानकर नजरअंदाज नहीं किए जा सकते। सवाल यह नहीं कि वीडियो कितनी तेजी से वायरल हुआ, सवाल यह है कि आखिर इस वीडियो के पीछे की सच्चाई क्या है?
अगर आरोप निराधार हैं तो उनकी सच्चाई सामने लाना जरूरी है। और यदि आरोपों में तथ्य है तो मामला कहीं अधिक गंभीर है। तब सवाल सिर्फ एक प्रोफेसर का नहीं, बल्कि उस व्यवस्था का होगा जिसमें शोधार्थी अपने भविष्य, मार्गदर्शन और पीएचडी की उम्मीद लेकर गुरु के सामने खड़ा होता है।
शोध की मेज और निजी संबंधों के बीच की सीमा अगर टूटती है तो सबसे पहले भरोसा टूटता है। यही भरोसा विश्वविद्यालय की असली पूंजी है।
इसलिए वीडियो को वायरल होने देना समाधान नहीं। विश्वविद्यालय प्रशासन और संबंधित जांच एजेंसियों को तथ्य सामने लाने होंगे। सच है तो कार्रवाई हो, झूठ है तो भ्रम दूर हो—लेकिन चुप्पी किसी भी स्थिति में जवाब नहीं हो सकती। प्रशासन को यह स्पष्ट करना होगा कि शिकायत मिली है या नहीं, जांच कौन करेगा और उसकी जवाबदेही किसकी होगी। विश्वविद्यालय की प्रतिष्ठा चुप्पी से नहीं, पारदर्शी जांच और स्पष्ट जवाबदेही से बचेगी।
BIG BREAKING: पूर्व कुलपति के बताए जा रहे वीडियो से विश्वविद्यालय में सनसनी…




