रीवा की कानून व्यवस्था के बीच इन दिनों एक बड़ा सवाल तैर रहा है—भाजपा सरकार में पुलिस आखिर करे तो करे क्या? कानून की किताब खोले या नेताओं का चेहरा देखे?
कुछ समय पहले चोरहटा थाने का घटनाक्रम खूब चर्चा में रहा। भाजपा के पूर्व विधायक केपी त्रिपाठी सहित अन्य भाजपा नेताओं के थाने में हंगामे और नारेबाजी के बीच तत्कालीन टीआई आशीष मिश्रा का वीडियो वायरल हुआ, जिसमें वे पूर्व विधायक के सामने हाथ जोड़कर खड़े दिखाई दिए और बार-बार “दादा… दादा…” कहते नजर आए। वीडियो वायरल हुआ तो पुलिस की खूब किरकिरी हुई और सवाल उठा कि थाने में कानून चलेगा या नेताओं का रौब?
इसी घटनाक्रम से जुड़ा पूर्व विधायक का एक वीडियो भी सामने आया था, जिसमें उन्होंने थाने में सीएसपी ऋतु उपाध्याय के लिए “असंवेदनशील औरत” जैसे शब्दों का इस्तेमाल किया था। हालांकि बाद में उन्होंने माफी भी मांगी। मगर तब तक यह मामला पुलिस की कार्यप्रणाली और राजनीतिक दबाव को लेकर कई सवाल खड़े कर चुका था।
अब कहानी का दूसरा अध्याय सिविल लाइन थाने में सामने आया। साहू समाज और भाजपा नेता वंशीलाल साहू के ज्ञापन सौंपने के दौरान टीआई विजय सिंह बघेल पर अभद्रता के आरोप लगे। मामला बढ़ा तो कार्रवाई हुई और टीआई को लाइन हाजिर कर थाने से हटा दिया गया।
यानी पुलिस के सामने अब शायद दो ही रास्ते बचे हैं—नेता आएं तो हाथ जोड़ लो, नहीं तो कुर्सी छोड़ लो!
अगर पुलिस अधिकारी नेताओं के सामने हाथ जोड़ता है तो विभाग की छवि पर सवाल उठते हैं। और अगर अधिकारी अपनी कुर्सी की गरिमा बचाते हुए नेताओं के कथित दबाव या व्यवहार का विरोध करता है, तो कार्रवाई की तलवार लटक जाती है।
ऐसे में रीवा की पुलिस के लिए शायद नया प्रशिक्षण मॉड्यूल तैयार होना चाहिए—“कानून व्यवस्था के साथ-साथ राजनीतिक शिष्टाचार कैसे निभाएं।”
पहला पाठ—नेता जी नाराज हों तो हाथ जोड़िए।
दूसरा पाठ—बहस से बचिए।
तीसरा पाठ—और अगर मामला फिर भी बिगड़ जाए तो लाइन में जाने के लिए मानसिक रूप से तैयार रहिए।
बेशक, किसी भी पुलिस अधिकारी का अभद्र व्यवहार स्वीकार्य नहीं होना चाहिए और शिकायत पर निष्पक्ष जांच होनी चाहिए। लेकिन उतना ही जरूरी यह भी है कि पुलिस को बिना राजनीतिक दबाव के कानून के मुताबिक काम करने का भरोसा मिले।
वरना सवाल सिर्फ एक टीआई का नहीं रहेगा। सवाल यह होगा कि रीवा में पुलिस की वर्दी का वजन ज्यादा है या सियासी पहुंच का?
और अगर हर रास्ता अंततः लाइन की ओर ही जाता है, तो फिर थाने में कानून की किताब रखने की जरूरत है या सिर्फ नेताओं की सूची?
क्योंकि हाथ जोड़ने पर भी किरकिरी और हाथ न जोड़ने पर कार्रवाई—ऐसे में पुलिस आखिर करे तो करे क्या?




