**रीवा।** एक तरफ प्रदेश का युवा रोजगार के लिए भटक रहा है, प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी में वर्षों लगा रहा है और सरकारी नौकरी के सीमित अवसरों के बीच एक-एक पद के लिए संघर्ष कर रहा है। दूसरी तरफ सरकारी सेवा से सेवानिवृत्त हो चुके अधिकारियों और चिकित्सकों का **कुर्सी से मोह खत्म होता नजर नहीं आ रहा**। रिटायरमेंट के बाद भी संविदा के रास्ते सरकारी व्यवस्था में वापसी और कम वेतन पर काम करने की तत्परता अब एक अलग तरह की बहस खड़ी कर रही है।
संजय गांधी स्मृति चिकित्सालय में सेवानिवृत्त चिकित्सक **डॉ. अतुल सिंह की दोबारा संविदा नियुक्ति** इसी बहस को जन्म दे रही है। क्षेत्रीय संचालक, स्वास्थ्य सेवाएं, रीवा संभाग के आदेश क्रमांक 4524, दिनांक 15 सितंबर 2026 का हवाला देते हुए उन्हें संविदा चिकित्सा अधिकारी के रूप में ज्वाइन कराया गया है। इसके बाद उन्हें संजय गांधी अस्पताल भेजे जाने तथा **प्रभारी अधिकारी आकस्मिक चिकित्सा और जनसंपर्क अधिकारी** की जिम्मेदारी दिए जाने की जानकारी सामने आई है।
### युवाओं के लिए पद कम, रिटायर लोगों के लिए रास्ते खुले?
मामला सिर्फ एक चिकित्सक की नियुक्ति तक सीमित नहीं है। सवाल उस व्यवस्था का है जिसमें एक ओर युवा चिकित्सक और बेरोजगार युवा सरकारी नौकरी के अवसरों का इंतजार कर रहे हैं, वहीं दूसरी ओर सेवानिवृत्ति के बाद भी अनुभवी अधिकारी संविदा के जरिए सरकारी संस्थानों में अपनी सेवाएं जारी रखने को तैयार हैं।
संविदा में नियमित सेवा की तुलना में कम वेतन मिल सकता है, इसके बावजूद यदि सेवानिवृत्त कर्मचारी दोबारा काम करने के लिए तैयार हैं तो इसका एक कारण यह भी माना जा सकता है कि वे अपने अनुभव और कार्यक्षमता को जारी रखना चाहते हैं। लेकिन सवाल यह है कि **क्या ऐसे पदों पर नए और योग्य युवाओं को अवसर देने की पर्याप्त संभावना तलाश की जाती है?**
### रिटायरमेंट के बाद भी कुर्सी नहीं छूट रही
सरकारी नौकरी में एक तय उम्र के बाद कर्मचारी सेवानिवृत्त होता है ताकि नई पीढ़ी के लिए पद और अवसर उपलब्ध हो सकें। लेकिन जब वही कर्मचारी सेवानिवृत्ति के बाद संविदा व्यवस्था के माध्यम से फिर उसी संस्थान में लौट आता है, तो यह सवाल स्वाभाविक है कि क्या विभाग के पास उस काम के लिए नए लोगों को मौका देने का विकल्प नहीं था?
डॉ. अतुल सिंह का मामला इसलिए भी चर्चा में है क्योंकि उन्होंने लंबे समय तक संजय गांधी अस्पताल में सेवाएं दीं और सीएमओ पद से सेवानिवृत्त हुए। अब उसी अस्पताल में संविदा नियुक्ति के बाद महत्वपूर्ण जिम्मेदारी मिलने से अस्पताल के भीतर और बाहर सवाल उठ रहे हैं कि आखिर विभाग ने उनकी पुनर्नियुक्ति को किस आवश्यकता के आधार पर उचित माना।
### ग्रामीण अस्पतालों में डॉक्टरों की कमी, फिर SGMH क्यों?
संविदा नियुक्ति के बाद उनकी तैनाती को लेकर भी सवाल है। रीवा संभाग के ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य संस्थानों में चिकित्सकों की आवश्यकता लगातार बनी रहती है। ऐसे में यह पूछा जा रहा है कि यदि विभाग को सेवानिवृत्त चिकित्सक की सेवाओं की आवश्यकता थी तो उनकी तैनाती ग्रामीण क्षेत्र के ऐसे अस्पताल में क्यों नहीं की गई जहां चिकित्सकों की कमी है?
इसके बजाय उन्हें संभाग के सबसे बड़े चिकित्सा संस्थानों में से एक संजय गांधी अस्पताल में भेजा गया और महत्वपूर्ण दायित्व सौंपे गए। विभाग को इस तैनाती का आधार सार्वजनिक करना चाहिए।
### अस्पताल पहले से निगरानी में
डॉ. सिंह की वापसी ऐसे समय हुई है जब संजय गांधी अस्पताल की व्यवस्थाओं को लेकर प्रशासन की निगरानी बढ़ी हुई है। हाल के निरीक्षणों में अस्पताल की ड्यूटी व्यवस्था, सफाई और अन्य व्यवस्थाओं को लेकर कमियां सामने आने के बाद अधिकारियों ने सुधार और नियमित निगरानी के निर्देश दिए हैं।
ऐसे माहौल में किसी सेवानिवृत्त चिकित्सक को दोबारा संविदा पर लाकर महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां देना स्वाभाविक रूप से चर्चा का विषय बन गया है।
### रोजगार के इंतजार में युवा, अवसरों पर सवाल
रीवा ही नहीं, पूरे प्रदेश में बड़ी संख्या में युवा मेडिकल, तकनीकी और अन्य पेशेवर डिग्रियां हासिल करने के बाद रोजगार की तलाश में हैं। सरकारी स्वास्थ्य संस्थानों में सीमित पदों के लिए बड़ी संख्या में अभ्यर्थी आवेदन करते हैं।
ऐसे में संविदा नियुक्तियों में भी यदि बार-बार सेवानिवृत्त कर्मचारियों को प्राथमिकता मिलती है तो युवा वर्ग के बीच यह सवाल उठना स्वाभाविक है कि **सेवानिवृत्ति की उम्र के बाद भी सरकारी कुर्सियां आखिर कितने समय तक पुराने चेहरों के लिए आरक्षित रहेंगी?**
अनुभव का उपयोग निश्चित रूप से महत्वपूर्ण है, लेकिन उसके साथ यह भी देखा जाना चाहिए कि क्या उसी काम के लिए योग्य युवाओं को प्रशिक्षण, अवसर और रोजगार देने का रास्ता बनाया जा सकता है।




