रीवा। अवधेश प्रताप सिंह विश्वविद्यालय के एक सेवानिवृत्त प्रोफेसर एवं पूर्व कुलपति के बताए जा रहे वीडियो ने विश्वविद्यालय के अकादमिक गलियारों में हलचल पैदा कर दी है। इंटरनेट मीडिया पर तेजी से प्रसारित हो रहे वीडियो को लेकर एक शोधार्थी छात्रा से कथित संबंधों और पीएचडी के दौरान अनुचित व्यवहार के गंभीर आरोप लगाए जा रहे हैं। दावा किया जा रहा है कि यह मामला प्रोफेसर के कार्यकाल के दौरान का है और सेवानिवृत्ति के बाद इससे जुड़े वीडियो सामने आए हैं। हालांकि, वायरल वीडियो की स्वतंत्र पुष्टि अभी नहीं हो सकी है।
मामला इसलिए गंभीर माना जा रहा है क्योंकि वीडियो से जिस व्यक्ति को जोड़ा जा रहा है, वे विश्वविद्यालय में प्रोफेसर रहने के साथ कुलपति की जिम्मेदारी भी संभाल चुके हैं। ऐसे में वीडियो से जुड़े दावों ने विश्वविद्यालय की कार्यप्रणाली और शोधार्थियों की सुरक्षा को लेकर भी सवाल खड़े कर दिए हैं।
पीएचडी के नाम पर शोषण के लगाए जा रहे आरोप
वायरल सामग्री में दावा किया जा रहा है कि संबंधित प्रोफेसर और शोधार्थी छात्रा के बीच संबंध केवल अकादमिक स्तर तक सीमित नहीं थे। इंटरनेट मीडिया पर यह भी आरोप लगाए जा रहे हैं कि शोध और अध्ययन के नाम पर छात्रा को निजी स्थानों पर बुलाया गया और उसके साथ कथित तौर पर अनुचित व्यवहार किया गया।
हालांकि, इन दावों की पुष्टि किसी स्वतंत्र जांच या आधिकारिक दस्तावेज से अभी नहीं हुई है। इसलिए यह स्पष्ट नहीं किया जा सकता कि वीडियो में दिखाई देने वाली परिस्थितियां क्या हैं और उसे किस समय तथा किस स्थान पर बनाया गया था। वीडियो के साथ प्रसारित किए जा रहे दावों और वास्तविक घटनाक्रम के बीच अंतर की जांच जरूरी है।
वीडियो सामने आने के बाद बढ़े सवाल
वायरल सामग्री में यह दावा भी किया जा रहा है कि शोधार्थी छात्रा की ओर से संबंधित प्रोफेसर को वीडियो भेजे गए और बाद में ये वीडियो इंटरनेट मीडिया तक पहुंच गए। यदि ऐसा हुआ है तो वीडियो सार्वजनिक होने की परिस्थितियां भी जांच का विषय बन सकती हैं। साथ ही यह पता लगाना जरूरी होगा कि वीडियो वास्तविक है या उसमें छेड़छाड़ की गई है।
मामले में सबसे अहम पक्ष स्वयं शोधार्थी छात्रा का है। यदि उसके साथ किसी प्रकार का दबाव, शोषण या अनुचित व्यवहार हुआ है तो उसकी शिकायत को गंभीरता से लेकर नियमानुसार जांच की जानी चाहिए। वहीं संबंधित प्रोफेसर का पक्ष भी सामने आना आवश्यक है, ताकि आरोपों की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सके।
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विश्वविद्यालय की व्यवस्था पर भी उठेंगे सवाल
शोधार्थी और शोध निर्देशक के बीच संबंध अकादमिक व्यवस्था की महत्वपूर्ण कड़ी हैं। शोधार्थियों को किसी भी प्रकार के दबाव या शोषण से बचाने के लिए विश्वविद्यालयों में शिकायत निवारण और लैंगिक उत्पीड़न संबंधी व्यवस्थाएं निर्धारित हैं। ऐसे में यदि इस मामले में कोई औपचारिक शिकायत हुई है तो विश्वविद्यालय प्रशासन के लिए उसकी जांच और कार्रवाई की स्थिति स्पष्ट करना महत्वपूर्ण होगा।
दूसरी ओर, यदि वीडियो को गलत पहचान या भ्रामक दावे के साथ प्रसारित किया जा रहा है तो संबंधित व्यक्ति की प्रतिष्ठा प्रभावित होने से पहले इसकी सच्चाई सामने आना भी जरूरी है।
जांच से ही खुलेगा वीडियो का सच
फिलहाल मामला वायरल वीडियो और सोशल मीडिया पर प्रसारित दावों के स्तर पर है। वीडियो की सत्यता, उसमें दिखाई देने वाले व्यक्ति की पहचान, शोधार्थी की पहचान और कथित घटनाक्रम की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसलिए इसे आधार बनाकर किसी व्यक्ति को दोषी ठहराना उचित नहीं होगा।
मामले में विश्वविद्यालय प्रशासन, पुलिस अथवा संबंधित शिकायत समिति की ओर से कोई आधिकारिक जानकारी सामने आती है तो उससे घटनाक्रम की वास्तविक स्थिति स्पष्ट हो सकेगी। फिलहाल विश्वविद्यालय से जुड़े इस प्रकरण ने एक बड़ा सवाल जरूर खड़ा किया है—यदि वायरल दावों में तथ्य है तो शोधार्थियों की शिकायतों और सुरक्षा की व्यवस्था पर कितनी प्रभावी निगरानी हो रही थी, और यदि दावे गलत हैं तो वायरल सामग्री के पीछे की सच्चाई क्या है? इन सवालों का जवाब अब निष्पक्ष जांच से ही मिल सकेगा।




