रीवा के सुपर स्पेशलिटी अस्पताल में पत्रकारों को मुख्य द्वार पर रोकने की घटना अब केवल मीडिया के प्रवेश का मामला नहीं है। यह सीधे-सीधे जवाबदेही का सवाल है।
यदि मीडिया के प्रवेश पर रोक लगाने का कोई अधिकृत आदेश नहीं था, तो फिर सुरक्षा गार्डों को पत्रकारों को रोकने का निर्देश किसने दिया? किस अधिकारी ने यह फैसला लिया? किसके कहने पर अस्पताल का गेट पत्रकारों के लिए बंद किया गया? और अब उस अधिकारी से जवाब कौन मांगेगा?
कलेक्टर के मौके पर पहुंचने और यह स्पष्ट करने के बाद कि मीडिया के प्रवेश पर रोक लगाने का कोई आधिकारिक आदेश नहीं है, जिम्मेदारी और भी तय होनी चाहिए। क्योंकि बिना आदेश के यदि किसी सरकारी अस्पताल में पत्रकारों को रोका गया, तो यह सिर्फ एक गलतफहमी कहकर खत्म कर देने वाला विषय नहीं है।
गलती हुई है तो जिम्मेदार सामने आए। आदेश दिया गया है तो आदेश देने वाला सामने आए। और यदि किसी ने बिना आदेश के यह कदम उठाया है तो उसकी जवाबदेही भी तय होनी चाहिए।
सरकारी अस्पताल किसी अधिकारी की निजी जागीर नहीं है। जनता के पैसे से चलने वाली स्वास्थ्य व्यवस्था जनता के सवालों से भाग नहीं सकती। पत्रकारों को गेट पर रोकने के बजाय अस्पताल प्रबंधन को यह बताना चाहिए कि आखिर ऐसा करने की जरूरत क्यों पड़ी।
और अब सबसे बड़ा सवाल प्रशासन से है—क्या 15 दिन का आश्वासन केवल अस्पताल की व्यवस्था सुधारने के लिए है, या पत्रकारों को रोकने वाले जिम्मेदार लोगों की पहचान और जवाबदेही तय करने के लिए भी?
क्योंकि यदि आज बिना स्पष्ट आदेश के पत्रकारों को रोक दिया गया और कल किसी अधिकारी की जिम्मेदारी तय किए बिना मामला दब गया, तो यह गलत परंपरा को बढ़ावा देगा।
व्यवस्था की खामी पर सवाल उठाना अपराध नहीं है। अपराध यदि कोई है, तो वह जवाबदेही से बचना है।
रीवा प्रशासन को अब सिर्फ आश्वासन नहीं, जवाब भी देना होगा।
पत्रकारों को गेट पर रोकने वाला हाथ किसका था—यह सवाल अब दरवाजे के बाहर नहीं छोड़ा जा सकता।
— संपादक, विंध्य वाणी



