रीवा में इंसाफ की मांग का एक टेंट बुधवार को उखाड़ दिया गया। साथ ही उस टेंट में बैठा वह पिता भी उठा दिया गया, जो 14 दिन से अन्न-जल त्यागकर अपनी बेटी कल्पना और उसके नवजात बच्चे की मौत का जवाब मांग रहा था।
प्रशासन की दलील है—पिता की जान बचाना जरूरी था। बिल्कुल, जान बचनी चाहिए। लेकिन फिर सवाल यह है कि जिस व्यवस्था को 14 दिन तक पिता की भूख नहीं दिखी, उसे 15वें दिन उसकी बिगड़ती हालत क्यों दिखाई दी?
अगर स्वास्थ्य इतना गंभीर था तो इतने दिनों तक वह धरने पर क्यों बैठा रहा? उसकी मांगों पर समय रहते निर्णायक पहल क्यों नहीं हुई? और सबसे बड़ा सवाल—कल्पना और उसके बच्चे की मौत के मामले में जिम्मेदारी आखिर तय कब होगी?
पुलिस बल पहुंचा, धरना हट गया, टेंट हट गया, पिता अस्पताल पहुंच गया। तस्वीर बदल गई। लेकिन मामले की असली तस्वीर अभी भी जस की तस है।
एक पीड़ित पिता सड़क पर बैठकर न्याय मांगता रहा। प्रशासन कहता रहा कि जांच चल रही है। अब पिता अस्पताल में है और व्यवस्था फिर जांच की बात कर रही है। लेकिन पीड़ित परिवार के लिए यह सवाल महज कागजी जांच का नहीं, अपनी बेटी और उसके बच्चे की मौत का जवाब पाने का है।
किसी अनशनकारी की जान बचाना प्रशासन का दायित्व है, लेकिन उसकी मांग को दफन कर देना प्रशासन का अधिकार नहीं हो सकता।
आज सिरमौर चौराहे से टेंट उखड़ गया।
कल कुर्सियां भी नहीं रहेंगी।
शायद धरना स्थल भी खाली हो जाएगा।
लेकिन उस पिता का सवाल?
वह कहां जाएगा?
और वह सवाल तब तक पीछा करता रहेगा, जब तक जांच निष्पक्ष रूप से पूरी होकर यह स्पष्ट नहीं करती कि आखिर कल्पना और उसके नवजात की मौत के लिए जिम्मेदारी किसकी थी।
टेंट हटाने से आंदोलन खत्म हो सकता है, लेकिन सवाल नहीं।
सवाल का जवाब देना ही पड़ेगा।



