भाजपा सरकार में इन दिनों प्रशासनिक व्यवस्था का मौसम कुछ बदला-बदला सा नजर आ रहा है। नियम-कायदे अपनी जगह हैं, फाइलें अपनी जगह हैं और सरकारी आदेश भी अपनी जगह हैं… लेकिन इनके बीच एक और चीज है, जिसका प्रभाव शायद सबसे ज्यादा दिखाई दे रहा है—नाराजगी।
कहा जाता है कि लोकतंत्र में जनता की आवाज सबसे ऊपर होती है। प्रशासन में नियमों की सर्वोच्चता होती है। लेकिन रीवा में दिखाई दे रहे कुछ घटनाक्रमों को देखें तो लगता है कि शायद अब **किसकी आवाज कितनी ऊंचाई तक पहुंचती है**, यह भी प्रशासनिक व्यवस्था का एक महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।
एक तरफ भाजपा नेता से अभद्रता की शिकायत होती है और थाना प्रभारी को थाने से हटाकर लाइन अटैच कर दिया जाता है। कार्रवाई इतनी तेज कि लगता है शिकायत ने सरकारी वाहन पकड़ लिया हो।
दूसरी तरफ नगर निगम में एक अधिकारी को लेकर चर्चाएं चलती हैं। कोई लिखित शिकायत सामने आए या न आए, लेकिन कानों से कानों तक पहुंचने वाली बातों की रफ्तार ऐसी कि अंततः राजस्व अधिकारी हेमंत त्रिपाठी की नगर निगम से पदस्थापना ही समाप्त हो जाती है।
**वाह! शिकायत लिखी जाए तो कार्रवाई, और शिकायत कान में कही जाए तो भी कार्रवाई।**
फिर सवाल उठता है—आखिर प्रशासनिक निर्णय का आधार क्या है?
नियम?
काम?
प्रदर्शन?
या फिर किसी का आहत अहंकार?
यह सवाल इसलिए भी जरूरी है क्योंकि हेमंत त्रिपाठी को नगर निगम में यूं ही नहीं लाया गया था। राजस्व विभाग में स्टाफ की कमी थी। तत्कालीन आयुक्त डॉ. सौरभ सोनावडे की मांग पर उन्हें नगर निगम में वापस लाया गया। यानी जिस अधिकारी की जरूरत महसूस हुई, उसे व्यवस्था ने वापस बुलाया।
फिर अचानक ऐसा क्या हुआ कि जरूरत बदल गई?
**क्या राजस्व विभाग में स्टाफ की कमी भी अचानक पूरी हो गई या फिर कमी सिर्फ स्टाफ की नहीं, किसी की सहनशीलता की थी?**
यह सवाल इसलिए भी उठता है क्योंकि नगर निगम की तस्वीर का दूसरा हिस्सा बिल्कुल अलग कहानी कहता है।
डे-एनयूएलएम के पांच कर्मचारियों की सेवा समाप्त हो चुकी है, लेकिन उनसे सेवाएं ली जा रही हैं। कुछ मामलों में तो मेहरबानी की ऐसी मिसाल दिखाई देती है कि सेवा में न रहने के बावजूद दूसरी शाखा का प्रभार भी मिल गया और सरकारी नोटशीट चलने लगी।
अब इसे व्यवस्था कहें या व्यवस्था का नया संस्करण—समझना मुश्किल है।
**जिसकी सेवा समाप्त, उसकी सेवा जारी।
जिसकी सेवा जरूरी, उसकी पदस्थापना समाप्त।**
नियमों की किताब अगर बोल पाती तो शायद पूछती—
**“मुझे लागू किस पर होना है?”**
और सबसे बड़ा सवाल—नगर निगम आयुक्त, निगम अध्यक्ष और महापौर की नजर आखिर कहां है?
क्या इन व्यवस्थाओं की जानकारी नहीं है?
अगर नहीं है तो प्रशासनिक निगरानी पर सवाल है।
अगर है तो कार्रवाई क्यों नहीं?
और अगर कार्रवाई का अधिकार है तो फिर अलग-अलग मामलों में अलग-अलग पैमाना क्यों?
अब जरा हेमंत त्रिपाठी की नगर निगम वापसी के बाद की गतिविधियों पर भी नजर डालिए।
राजस्व विभाग में लौटने के बाद अगर कोई अधिकारी फाइलों को देखने लगे, पुराने मामलों को समझने लगे, राजस्व वसूली और आम जनता से जुड़े मामलों की पड़ताल करने लगे तो यह तो उसका काम ही हुआ।
लेकिन सरकारी दफ्तर में कभी-कभी सबसे बड़ा खतरा यही होता है कि **कोई अपना काम ईमानदारी से करने लगे।**
क्योंकि फाइलें खुलेंगी तो सवाल निकलेंगे।
सवाल निकलेंगे तो जवाब मांगने पड़ेंगे।
जवाब मांगे जाएंगे तो कुछ चेहरों की परेशानी बढ़ सकती है।
और अगर कुछ ऐसे मामले सामने आने लगें जिनमें आम आदमी की जेब पर बोझ और किसी खास की जेब में वजन बढ़ने की कहानी छिपी हो, तो फिर परेशानी स्वाभाविक है।
हालांकि यह सब केवल सवाल हैं। प्रमाण और जांच का काम संबंधित संस्थाओं का है। लेकिन सवाल पूछना तो लोकतंत्र का अधिकार है।
कहा जा रहा है कि अधिकारी की नजर कुछ ऐसे मामलों पर भी जाने लगी थी, जिनकी तह तक पहुंचने पर कई लोगों के हित प्रभावित हो सकते थे।
बस फिर क्या था!
**राजनीति का पुराना तमगा निकाला गया।
कानों में कुछ फुसफुसाया गया।
कुछ पुराने रिश्ते याद दिलाए गए।
कुछ नए संदेह पैदा किए गए।**
और आवाज ऊपर तक पहुंचती रही।
जब तक पहुंचती रही, तब तक शायद फाइल भी रास्ता तलाशती रही।
और अंत में रास्ता मिल गया—**नगर निगम से बाहर जाने का।**
अब यह महज संयोग है या किसी रणनीति का हिस्सा, यह तो जिम्मेदार लोग ही बेहतर बता सकते हैं।
लेकिन एक सवाल जरूर है—अगर हेमंत त्रिपाठी को राजनीतिक चश्मे से देखना ही था, तो फिर उन्हें वापस नगर निगम बुलाते समय चश्मा कहां था?
और अगर वह काम के योग्य थे, तो फिर हटाने की जरूरत क्यों पड़ी?
**क्या बीच में उनकी गलती सिर्फ इतनी थी कि उन्होंने कुछ लोगों की तरह राजनीतिक पहचान के आगे सिर नहीं झुकाया?**
यहां एक और दिलचस्प पहलू है।
कहा जा रहा है कि वरिष्ठ भाजपा नेताओं से जुड़े कामों को प्राथमिकता दी जा रही थी। फिर शिकायत किस बात की?
शायद काम से शिकायत नहीं थी।
शायद शिकायत यह थी कि **काम के साथ चरण-वंदना मुफ्त में नहीं मिल रही थी।**
वरिष्ठ नेता और वरिष्ठता का अपना सम्मान होता है। लेकिन हर उस व्यक्ति को वरिष्ठ नेता के बराबर मान लेना, जो खुद को वरिष्ठ नेताओं के बराबर समझने लगा हो—यह प्रशासनिक नियमावली में शायद अभी तक शामिल नहीं हुआ है।
यही शायद असली परेशानी रही होगी।
क्योंकि अधिकारी अगर काम करेगा, तो नियम देखेगा।
नियम देखेगा तो पद देखेगा।
पद देखेगा तो जिम्मेदारी देखेगा।
लेकिन अगर वह हर दरवाजे पर झुककर सलाम नहीं करेगा, तो कुछ लोगों को यह व्यवस्था शायद अधूरी लगे।
**अब सवाल यह है कि सरकारी अधिकारी से काम चाहिए या चरण-वंदना?**
अगर काम चाहिए तो फिर काम करने दीजिए।
अगर नियम चाहिए तो फिर नियम सब पर समान लागू कीजिए।
अगर राजनीतिक दबाव नहीं है तो फिर फैसलों की पारदर्शिता से डर किस बात का?
रीवा की जनता यह जानना चाहती है कि नगर निगम आखिर किस व्यवस्था से चल रहा है।
एक तरफ सेवा समाप्त कर्मचारियों से काम जारी है।
दूसरी तरफ स्टाफ की कमी वाले विभाग से अधिकारी हट रहा है।
एक तरफ नियमों की बात होती है।
दूसरी तरफ नियमों की सुविधानुसार व्याख्या होती दिखाई देती है।
और इन सबके बीच एक अधिकारी की कुर्सी चली जाती है।
**कुर्सी गई तो गई, लेकिन सवाल वहीं खड़ा है।**
क्या अब सरकारी सेवा में अधिकारी का मूल्यांकन उसके काम से होगा या उसके राजनीतिक संपर्कों से?
क्या प्रशासनिक निर्णय फाइलों में तैयार होंगे या फिर पहले कहीं और तय होकर फाइल तक पहुंचेंगे?
और सबसे महत्वपूर्ण—
**क्या भाजपा सरकार में अब नाराजगी भी एक प्रशासनिक शक्ति बन चुकी है?**
अगर जवाब ‘नहीं’ है तो बहुत अच्छी बात है।
फिर नगर निगम की इन विसंगतियों पर खुलकर जवाब आना चाहिए।
क्योंकि जनता को यह भरोसा चाहिए कि **सरकार में कुर्सियां नियम से बदलती हैं, किसी के मुंह फूलने से नहीं।**
वरना कल कोई यह न पूछ बैठे—
**“हुजूर, फाइल पर नोटशीट बाद में लगती है या पहले यह देखा जाता है कि किसका मूड कैसा है?”**




