A shocking picture has emerged from Rewa: one in every four pregnant women in the district is suffering from anemia
रीवा। जिले में गर्भवती महिलाओं के स्वास्थ्य को लेकर सामने आए ताजा आंकड़ों ने स्वास्थ्य विभाग की चिंता बढ़ा दी है। राष्ट्रीय स्वास्थ्य मिशन की हाई-रिस्क प्रेग्नेंसी रिपोर्ट के मुताबिक जिले में पंजीकृत 8717 गर्भवतियों में से 2072 महिलाएं मध्यम एनीमिया (हीमोग्लोबिन 7 से 9.9 ग्राम) से पीडि़त मिली हैं। यानी जिले की हर चौथी गर्भवती महिला खून की कमी से जूझ रही है। चिंताजनक बात यह है कि इनमें से सिर्फ 357 महिलाओं का ही निर्धारित प्रोटोकॉल के तहत उपचार (एफसीएम/आयरन इंजेक्शन आदि) हो पाया, जबकि 1715 महिलाएं अब भी समुचित उपचार से वंचित हैं। स्वास्थ्य विशेषज्ञों का कहना है कि गर्भावस्था के दौरान एनीमिया केवल मां ही नहीं, बल्कि गर्भस्थ शिशु के लिए भी गंभीर खतरा बन सकता है। इससे समय पूर्व प्रसव, कम वजन के बच्चे का जन्म, प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव और मातृ मृत्यु तक का जोखिम बढ़ जाता है। ऐसे मामलों में समय पर उपचार सबसे प्रभावी उपाय माना जाता है लेकिन जिले के आंकड़े उपचार व्यवस्था की धीमी रफ्तार उजागर कर रहे हैं।
जवा में 3 प्रतिशत को मिला उपचार
रिपोर्ट के अनुसार जिले में एनीमिया की दर 24 प्रतिशत है, जबकि उपचार का प्रतिशत महज 17 प्रतिशत तक सीमित है। यानी जिन महिलाओं में एनीमिया की पुष्टि हुई, उनमें से पांच में केवल एक को ही आवश्यक उपचार मिल सका।
सबसे खराब स्थिति जवा विकासखंड की सामने आई है। यहां 1221 गर्भवतियों के पंजीयन में 442 महिलाएं एनीमिया से पीडि़त मिलीं लेकिन केवल 14 महिलाओं का ही उपचारात्मक प्रबंधन हो सका। उपचार का प्रतिशत मात्र 3 प्रतिशत रहा। यानी अधिकांश महिलाएं उपचार से वंचित हैं।
रीवा शहर में भी संतोषजनक नहीं स्थिति
रीवा विकासखंड में जिले का सबसे अधिक 2496 गर्भवतियों का पंजीयन हुआ। इनमें 442 महिलाएं एनीमिया से ग्रस्त मिलीं, लेकिन सिर्फ 86 महिलाओं का ही उपचार किया गया। उपचार का प्रतिशत 19 रहा, जो अपेक्षा से काफी कम है। गंगेव में 1186 गर्भवतियों में 284 महिलाएं एनीमिया से पीडि़त पाई गईं। इनमें 127 महिलाओं का उपचार किया गया। 45 प्रतिशत उपचार दर के साथ गंगेव जिले में सबसे बेहतर प्रदर्शन करने वाला विकासखंड रहा। रायपुर कर्चुलियान में 301 एनीमिया पीडि़त महिलाओं में 64, सिरमौर में 238 में 31 तथा त्योंथर में 365 में 35 महिलाओं का ही उपचार किया जा सका।
लक्ष्य के अनुरूप नहीं गति
स्वास्थ्य विभाग के अधिकारियों का कहना है कि गंभीर और मध्यम एनीमिया वाली गर्भवतियों की सूची तैयार कर उन्हें आयरन थेरेपी, पोषण परामर्श और नियमित जांच से जोड़ा जा रहा है। हालांकि आंकड़े बताते हैं कि अभी भी उपचार की गति लक्ष्य के अनुरूप नहीं है। विशेषज्ञों का मानना है कि यदि एनीमिया की पहचान के बाद समय पर उपचार नहीं मिला तो मातृ एवं शिशु मृत्यु दर कम करने के प्रयास प्रभावित हो सकते हैं। इसलिए प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों से लेकर जिला अस्पताल तक हाई-रिस्क गर्भवतियों की निगरानी और उपचार को प्राथमिकता देना जरूरी है।
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